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लघुकथा व हास्य व्यंग्य
कल्पना और जल्पना के बीच का बीज सत्य (लघुकथा)
● डॉ. अमलदार नीहार
"और बताइये व्योमकेशजी! कैसे हैं..?""नमस्कार सर! आपकी मेहरबानी है साहब!""मेहर----बानी! हा-हा-हा-हा-हा। यह सब छोड़िये, वह तो आपकी ही है।"
"सर! आपने तो...
नाटक अभी जारी है (कहानी ) – डॉ.अमलदार नीहार
बात बहुत पुरानी है, शायद सात-आठ सौ बरस या उससे कुछ पहले की। तब हिमालय और समुद्र से घिरे इस विशाल भूभाग पर छोटी-छोटी...
गीता की सौगन्ध (लघुकथा ) – डाॅ.अमलदार ‘नीहार’
‘‘तुम्हारा नाम..?’’ कठघरे में खड़े फटेहाल व्यक्ति से सरकारी वकील ने पूछा।
‘‘लोग हमें ‘चिथरुआ’ कहते हैं साहब, पड़ोस के बच्चे ‘काका’ और हफ्ता वसूलने...
सुुर असुर कौन सुंदर (हास्य-व्यंग्य ) – प्रेम जनमेजय
यह शीर्षक पढ़कर आपके चेहरे पर व्यंग्यात्मक मुस्कान खेल गई होगी जैसे कि चारु चंद्र की चंचल किरणे खेलती हैं या जैसे चुनाव के...
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संपादकीय
आलेख
भारतीय संस्कृति में महाशक्ति विश्वकर्मा : मिथक और यथार्थ खण्ड :...
डॉ. अमलदार ‘नीहार’
अवकाशप्राप्त प्रोफेसर - बलिया (उत्तर प्रदेश)
रजोजुषे जन्मनि सत्त्ववृत्तये स्थितौ प्रजानां प्रलये तमः स्पृशे।
अजाय सर्गस्थितिनाशहेतवे त्रयीमयाय त्रिगुणात्मने नमः।।
हिन्दी भावानुवाद
हे परमात्मन्! सृष्टि-समुद्भव तुझसे,...































